आज के समय में बहुत से कपल्स को प्रेग्नेंसी के लिए कई तरह की दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। बदलती लाइफस्टाइल, देर से हुई शादी, हेल्थ प्रॉब्लम्स और बढ़ता मानसिक तनाव फर्टिलिटी पर असर डाल सकता है। ऐसे में IVF ट्रीटमेंट कई कपल्स के लिए उम्मीद की नई किरण बनकर सामने आया है। इस ब्लॉग में हम IVF ट्रीटमेंट गाइड को आसान और सरल भाषा में विस्तार से समझेंगे, ताकि IVF से जुड़ा हर सवाल और हर स्टेप आपको साफ़-साफ़ समझ आ सके।
IVF ट्रीटमेंट क्या है?
IVF का पूरा नाम है In Vitro Fertilization। आसान शब्दों में कहें तो IVF एक ऐसा ट्रीटमेंट है जिसमें महिला के एग्स (स्त्रीबीज) और पुरुष के स्पर्म (शुक्राणु) को बॉडी के बाहर लैब में मिलाया जाता है। जब एग और स्पर्म मिलकर एम्ब्रियो बनाते हैं, तब उस एम्ब्रियो को महिला की यूटेरस में ट्रांसफर किया जाता है। अगर सब कुछ सही रहा, तो प्रेग्नेंसी ठहर जाती है।
IVF ट्रीटमेंट उन कपल्स के लिए मददगार होता है, जिन्हें लंबे समय से नेचुरल तरीके से प्रेग्नेंसी नहीं मिल रही होती।
IVF ट्रीटमेंट की जरूरत कब पड़ती है?
हर कपल को IVF की जरूरत नहीं होती। लेकिन कुछ कंडीशन्स में डॉक्टर IVF सजेस्ट करते हैं।
1. फैलोपियन ट्यूब्स में ब्लॉकेज
अगर महिला की फैलोपियन ट्यूब्स बंद हैं या डैमेज हो चुकी हैं, तो एग और स्पर्म मिल नहीं पाते। ऐसे में IVF एक अच्छा ऑप्शन माना जाता है।
PCOD और PCOS में एग्स का सही समय पर रिलीज न होना एक बड़ी समस्या होती है। IVF में एग्स को दवाइयों की मदद से तैयार किया जाता है, जिससे प्रेग्नेंसी के चांस बढ़ जाते हैं।
3. स्पर्म काउंट या स्पर्म क्वालिटी कम होना
अगर पुरुष में स्पर्म काउंट कम है या स्पर्म की मूवमेंट सही नहीं है, तो IVF और ICSI जैसे ट्रीटमेंट से मदद मिल सकती है।
इस कंडीशन में यूटेरस के बाहर टिश्यू बढ़ने लगता है, जिससे प्रेग्नेंसी में परेशानी आती है। IVF इसमें काफी असरदार हो सकता है।
5. उम्र का बढ़ना
महिला की उम्र बढ़ने के साथ एग्स की क्वालिटी कम होने लगती है। ऐसे में IVF प्रेग्नेंसी के चांस बढ़ा सकता है।
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IVF ट्रीटमेंट शुरू करने से पहले क्या जांच होती है?
IVF शुरू करने से पहले दोनों पार्टनर की पूरी जांच की जाती है, ताकि सही ट्रीटमेंट प्लान बनाया जा सके।
• महिला के लिए जरूरी टेस्ट •
- AMH टेस्ट, जिससे एग रिजर्व की जानकारी मिलती है
- अल्ट्रासाउंड, जिससे ओवरी और यूटेरस की स्थिति पता चलती है
- हार्मोन टेस्ट
- ब्लड टेस्ट और इंफेक्शन स्क्रीनिंग
• पुरुष के लिए जरूरी टेस्ट •
- हार्मोन प्रोफाइल
- ब्लड टेस्ट
इन सभी टेस्ट के आधार पर डॉक्टर IVF की सही स्ट्रेटेजी तय करते हैं।
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IVF ट्रीटमेंट के स्टेप्स
IVF एक स्टेप बाय स्टेप प्रोसेस होता है। आइए इसे आसान भाषा में समझते हैं।
1. ओवरी स्टिमुलेशन
इस स्टेप में महिला को कुछ दवाइयां दी जाती हैं, जिससे ओवरी में एक से ज्यादा एग्स तैयार हो सकें। यह प्रोसेस करीब 8 से 12 दिन का होता है। इस दौरान रेगुलर अल्ट्रासाउंड और ब्लड टेस्ट से एग्स की ग्रोथ पर नजर रखी जाती है।
2. एग रिट्रीवल
जब एग्स पूरी तरह से तैयार हो जाते हैं, तब एक छोटी सी प्रोसीजर से एग्स निकाले जाते हैं। यह प्रोसीजर आमतौर पर पेनलेस होती है और कुछ ही समय में पूरी हो जाती है।
3. स्पर्म कलेक्शन
एग रिट्रीवल के दिन ही पुरुष से स्पर्म सैंपल लिया जाता है। जरूरत पड़ने पर सर्जिकल तरीके से भी स्पर्म लिए जा सकते हैं।
4. फर्टिलाइजेशन
लैब में एग और स्पर्म को मिलाया जाता है। कई बार ICSI टेक्निक का इस्तेमाल किया जाता है, जिसमें एक स्पर्म को सीधे एग में इंजेक्ट किया जाता है।
फर्टिलाइजेशन के बाद एम्ब्रियो को 3 से 5 दिन तक लैब में ऑब्जर्व किया जाता है। इस दौरान उसकी ग्रोथ और क्वालिटी को चेक किया जाता है।
6. एम्ब्रियो ट्रांसफर
अच्छी क्वालिटी वाले एम्ब्रियो को महिला की यूटेरस में ट्रांसफर किया जाता है। यह प्रोसेस आसान और पेनलेस होता है।
एम्ब्रियो ट्रांसफर के करीब 12 से 14 दिन बाद प्रेग्नेंसी टेस्ट किया जाता है।
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IVF ट्रीटमेंट के दौरान किन बातों का ध्यान रखें?
IVF के दौरान सही केयर बहुत जरूरी होती है।
✓ डॉक्टर की दी हुई दवाइयां टाइम पर लें
✓ हेल्दी डाइट फॉलो करें
✓ ज्यादा स्ट्रेस न लें
✓ स्मोकिंग और अल्कोहल से दूर रहें
✓ पूरी नींद लें
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IVF ट्रीटमेंट के फायदे
IVF के फायदे कई स्तरों पर देखने को मिलते हैं – फिजिकल, इमोशनल और साइंटिफिक। आइए इन फायदों को थोड़ा और विस्तार से समझते हैं।
1. प्रेग्नेंसी के चांस काफी बढ़ जाते हैं
IVF की प्रोसेस में एग और स्पर्म को लैब में कंट्रोल्ड माहौल में मिलाया जाता है, इसलिए फर्टिलाइजेशन के चांस ज्यादा होते हैं। सही एम्ब्रियो को सेलेक्ट कर के यूटेरस में ट्रांसफर किया जाता है, जिससे सक्सेस की संभावना बेहतर हो जाती है।
2. कई तरह की फर्टिलिटी प्रॉब्लम्स का सॉल्यूशन
फैलोपियन ट्यूब्स ब्लॉक हों, PCOD या PCOS की समस्या हो, एंडोमेट्रियोसिस हो या पुरुष में स्पर्म काउंट और स्पर्म क्वालिटी कम हो – IVF इन सभी कंडीशन्स में असरदार साबित हो सकता है।
3. ज्यादा उम्र में भी पेरेंट्स बनने का मौका
IVF ट्रीटमेंट ज्यादा उम्र में भी पेरेंट्स बनने का मौका देता है। सही प्लानिंग, टेस्टिंग और मॉनिटरिंग के साथ डॉक्टर उम्र से जुड़े रिस्क को काफी हद तक मैनेज कर सकते हैं।
4. पूरी तरह प्लान्ड और साइंटिफिक प्रोसेस
IVF का हर स्टेप साइंटिफिक तरीके से प्लान किया जाता है। ओवरी स्टिमुलेशन से लेकर एम्ब्रियो ट्रांसफर तक हर चीज डॉक्टर की निगरानी में होती है। रेगुलर अल्ट्रासाउंड और ब्लड टेस्ट के जरिए बॉडी के रिस्पॉन्स को समझा जाता है, जिससे किसी भी समस्या को समय रहते संभाला जा सकता है।
5. हेल्दी एम्ब्रियो सेलेक्शन की सुविधा
IVF में एम्ब्रियो की ग्रोथ और क्वालिटी को लैब में करीब से देखा जाता है। जरूरत पड़ने पर जेनेटिक टेस्टिंग का ऑप्शन भी लिया जा सकता है, जिससे हेल्दी एम्ब्रियो को सेलेक्ट किया जा सके। इससे हेल्दी प्रेग्नेंसी और हेल्दी बेबी की संभावना बढ़ जाती है।
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IVF ट्रीटमेंट के साइड इफेक्ट्स
कुछ महिलाओं और कपल्स को IVF ट्रीटमेंट के दौरान या बाद में कुछ साइड इफेक्ट्स या रिस्क महसूस हो सकते हैं। हालांकि ज्यादातर मामलों में ये साइड इफेक्ट्स टेम्पररी होते हैं और सही मेडिकल केयर से कंट्रोल में आ जाते हैं।
1. हार्मोन दवाइयों से होने वाले बदलाव
IVF के दौरान ओवरी स्टिमुलेशन के लिए हार्मोन दवाइयां दी जाती हैं। इन दवाइयों की वजह से कुछ महिलाओं को मूड स्विंग्स, थकान, सिरदर्द, पेट में भारीपन, हल्की सूजन या बेचैनी महसूस हो सकती है।
2. ओवरी हाइपर स्टिमुलेशन सिंड्रोम (OHSS)
कुछ रेयर केस में ओवरी दवाइयों पर जरूरत से ज्यादा रिएक्ट कर सकती है, जिसे ओवरी हाइपर स्टिमुलेशन सिंड्रोम कहा जाता है। इसमें पेट दर्द, ज्यादा सूजन, वजन बढ़ना या सांस लेने में तकलीफ हो सकती है।
3. मल्टीपल प्रेग्नेंसी का रिस्क
अगर एक से ज्यादा एम्ब्रियो ट्रांसफर किए जाएं, तो ट्विन्स या ट्रिपलेट्स की संभावना बढ़ सकती है। लेकिन आजकल ज्यादातर सेंटर्स सिंगल एम्ब्रियो ट्रांसफर को प्राथमिकता देते हैं।
4. इमोशनल और मेंटल स्ट्रेस
IVF ट्रीटमेंट सिर्फ बॉडी पर ही नहीं, बल्कि मन पर भी असर डालता है। रिजल्ट का इंतजार, बार-बार टेस्ट और फेलियर का डर कई बार मानसिक तनाव बढ़ा सकता है।
5. हर साइकल में सक्सेस न मिलना
IVF एक एडवांस ट्रीटमेंट है, लेकिन हर बार सक्सेस मिलना जरूरी नहीं होता। कुछ कपल्स को प्रेग्नेंसी के लिए एक से ज्यादा IVF साइकल्स की जरूरत पड़ सकती है।
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IVF से जुड़े कुछ आम मिथक
मिथक 1: IVF हमेशा आखिरी ऑप्शन होता है
यह जरूरी नहीं है। कई कंडीशन्स में IVF फर्स्ट ऑप्शन भी हो सकता है।
मिथक 2: IVF से हमेशा ट्विन्स होते हैं
आजकल सिंगल एम्ब्रियो ट्रांसफर किया जाता है, जिससे ट्विन्स का रिस्क कम होता है।
मिथक 3: IVF बहुत दर्दनाक होता है
IVF के ज्यादातर स्टेप्स पेनलेस होते हैं।
IVF ट्रीटमेंट की सक्सेस रेट
IVF की सक्सेस रेट कई बातों पर डिपेंड करती है, जैसे महिला की उम्र, एग और स्पर्म की क्वालिटी, लाइफस्टाइल और मेडिकल कंडीशन। डॉक्टर हर कपल के लिए अलग-अलग रिजल्ट की संभावना बताते हैं।
निष्कर्ष-
IVF ट्रीटमेंट उन कपल्स के लिए एक मजबूत उम्मीद है, जो लंबे समय से पेरेंट्स बनने का सपना देख रहे हैं। सही जानकारी, सही डॉक्टर और सही केयर के साथ IVF जर्नी को आसान और सफल बनाया जा सकता है। अगर आप IVF के बारे में सोच रहे हैं, तो समय पर फर्टिलिटी स्पेशलिस्ट से सलाह जरूर लें और अपने सपनों को नई उड़ान दें।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)
1: IVF ट्रीटमेंट में कितना समय लगता है?
IVF का एक पूरा साइकल आमतौर पर 4 से 6 हफ्तों में पूरा हो जाता है।
2: क्या IVF ट्रीटमेंट दर्दनाक होता है?
IVF के ज्यादातर स्टेप्स पेनलेस होते हैं और जरूरत पड़ने पर मेडिकेशन दी जाती है।
3: IVF किस उम्र तक करवाया जा सकता है?
महिला की उम्र और एग क्वालिटी के आधार पर IVF 40 की उम्र के बाद भी संभव हो सकता है।
4: क्या IVF से हमेशा ट्विन्स होते हैं?
नहीं, आजकल सिंगल एम्ब्रियो ट्रांसफर किया जाता है जिससे ट्विन्स का रिस्क कम रहता है।
5: IVF की सक्सेस रेट किन बातों पर निर्भर करती है?
IVF की सक्सेस रेट उम्र, एग-स्पर्म क्वालिटी, हेल्थ और लाइफस्टाइल पर निर्भर करती है।


